जनता की उम्मीदों और आकांक्षाओं की जीत सीएम धामी ने बंगाल चुनाव नतीजों पर दी प्रतिक्रिया

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उत्तराखंड की धरती से निकली समान नागरिक संहिता की धारा अब देश के पूर्वी राज्यों असम और पश्चिम बंगाल तक पहुँच गई है। हालिया चुनावी नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि यूसीसी केवल एक कानून नहीं, बल्कि भाजपा के लिए एक बड़ा 'गेमचेंजर' साबित हुआ है। असम में भाजपा की सत्ता में वापसी और पश्चिम बंगाल में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद अब इन दोनों राज्यों में उत्तराखंड की तर्ज पर समान नागरिक संहिता लागू होने का रास्ता साफ हो गया है।

उत्तराखंड से शुरू हुई समान नागरिक संहिता की पहल अब राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। हाल ही में असम और पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों के बाद इस कानून को लेकर नई हलचल तेज हो गई है। चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने अपने संकल्प पत्र में यूसीसी लागू करने का वादा किया था, और चुनावी नतीजों के बाद अब इसके लागू होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है। दरअसल, उत्तराखंड ने देश में यूसीसी लागू करने की दिशा में ऐतिहासिक पहल की। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में किए गए वादे को पूरा करते हुए राज्य सरकार ने 2025 में इसे लागू किया। इसके साथ ही उत्तराखंड आजादी के बाद यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बन गया। इस कदम को भाजपा ने अपने ‘डबल इंजन’ मॉडल की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। उत्तराखंड के इस मॉडल का असर अब अन्य राज्यों में भी दिखाई देने लगा है। इसी साल मार्च में गुजरात में भी समान नागरिक संहिता से जुड़ा विधेयक विधानसभा में पारित किया गया। इसके अलावा कई राज्यों में इस दिशा में विचार-विमर्श जारी है, जिससे संकेत मिलता है कि यूसीसी धीरे-धीरे राष्ट्रीय एजेंडा बनता जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूसीसी का मुद्दा मतदाताओं के बीच प्रभावी रहा है। असम में भाजपा की सत्ता में वापसी और पश्चिम बंगाल में पार्टी को मिली बड़ी सफलता के पीछे इस वादे को भी एक अहम कारण माना जा रहा है। यह पहली बार है जब बंगाल में भाजपा ने इतनी मजबूत स्थिति हासिल की है, जिससे उसके एजेंडे को नई ताकत मिली है। इस पर पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत केवल राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों और आकांक्षाओं की जीत है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘डबल इंजन सरकार’ विकास और सुशासन का पर्याय बन चुकी है। मुख्यमंत्री धामी ने यूसीसी की तुलना गंगोत्री से निकलने वाली गंगा से करते हुए कहा कि जिस तरह गंगा पूरे देश को जीवन देती है, उसी तरह यूसीसी की धारा भी अब देवभूमि से निकलकर अन्य राज्यों तक पहुंच रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में और राज्य इस दिशा में आगे बढ़ेंगे। हालांकि, यूसीसी को लेकर देश में अलग-अलग मत हैं और इसे लेकर सामाजिक व राजनीतिक बहस जारी है। बावजूद इसके, हालिया चुनावी नतीजों ने यह साफ संकेत दिया है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रहेगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि असम और पश्चिम बंगाल में यूसीसी कब और किस रूप में लागू होता है, और इसका देश की राजनीति व समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है।