थारू समाज की प्रसिद्ध लोकगायिका रिंकू राणा का सड़क हादसे में निधन, मुख्यमंत्री धामी ने जताया गहरा शोक

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उत्तराखंड की लोक संस्कृति, विशेषकर थारू जनजाति समाज के संगीत को नई पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध लोकगायिका रिंकू राणा (36 वर्ष) का गुरुवार को एक सड़क दुर्घटना में दुखद निधन हो गया। रिंकू राणा होली मनाकर अपने मायके से वापस लौट रही थीं, तभी काल के ग्रास ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। उनकी मौत की खबर से पूरे थारू समाज और लोक कलाकारों में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके निधन को प्रदेश की लोक संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है।

जानकारी के अनुसार, नानकमत्ता के नौगजा निवासी रिंकू राणा होली का त्योहार मनाने अपने मायके बिचपुरी (नानकमत्ता) गई हुई थीं। गुरुवार को वह अपनी भतीजी के साथ स्कूटी पर सवार होकर वापस अपने घर लौट रही थीं। इसी दौरान रास्ते में ईंटों से भरी एक तेज रफ्तार अनियंत्रित ट्रैक्टर-ट्रॉली ने उनकी स्कूटी को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि रिंकू राणा और उनकी भतीजी सड़क पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गईं। आस-पास मौजूद लोगों ने तत्काल दोनों को अस्पताल पहुँचाया। हालांकि, अस्पताल पहुँचने पर चिकित्सकों ने जांच के बाद रिंकू राणा को मृत घोषित कर दिया। उनकी भतीजी का उपचार फिलहाल जारी है। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर खटीमा उपजिला अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। रिंकू राणा थारू जनजाति समाज की पहली ऐसी महिला कलाकार थीं, जो इतनी तेजी से उभरी थीं। वह प्रसिद्ध कलाकार बंटी राणा के सांस्कृतिक दल की प्रमुख सदस्य थीं और उनके साथ मिलकर राज्य स्तरीय मंचों पर थारू संस्कृति और लोकसंगीत की प्रस्तुति देती थीं। 36 वर्षीय रिंकू अपने पीछे पति महेश सिंह और 9 वर्षीय पुत्र निशांत को बिलखता छोड़ गई हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए कहा, "थारू जनजाति की प्रसिद्ध लोकगायिका रिंकू राणा जी के सड़क दुर्घटना में असामयिक निधन का अत्यंत दुःखद समाचार प्राप्त हुआ। लोकसंस्कृति और लोकसंगीत के संरक्षण में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।" खटीमा विधायक और उपनेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी ने भी उनके घर पहुंचकर परिजनों को ढांढस बंधाया और उनके निधन को सीमांत क्षेत्र के सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका बताया। लोक कलाकारों का कहना है कि रिंकू ने अपने गीतों के माध्यम से थारू समाज की समृद्ध परंपराओं को जो पहचान दिलाई, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।